शिवाचार्य केदारलिंग होंगे केदारनाथ धाम के नए रावल, शिवरात्रि पर होगा औपचारिक ऐलान, कपाट खुलने की तिथि की भी घोषणा
रैबार डेस्क: बाबा केदार की आध्यात्मिक विरासत और 324 वर्षों की परंपरा में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। महाराष्ट्र के नांदेड़ में संपन्न हुई पट्टाभिषेक रजत जयंती के पावन अवसर पर केदार जगद्गुरु रावल भीमाशंकर लिंग शिवाचार्य महाराज ने अपने स्वास्थ्य कारणों से दायित्वों से विराम लेने और नए उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी है।
महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित अपने मठ में केदारनाथ के वर्तमान रावल 70 वर्षीय भीमाशंकर लिंग ने कहा कि वह स्वास्थ्य कारणों से अब केदारनाथ के रावल का पद संभालने में असमर्थ हैं। इसलिए वह अपने शिष्य शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हैं। उन्होंने सुयोग्य शिष्य शिवाचार्य शांति लिंग महाराज (जिन्हें केदार लिंग के नाम से भी जाना जाता है) को केदारपीठ का नया जगद्गुरु रावल घोषित किया। शांति लिंग महाराज लंबे समय से रावल जी के सान्निध्य में रहकर केदारनाथ की प्राचीन पूजा-पद्धति और वीरशैव परंपराओं का गूढ़ प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
रावल के इस लिखित बयान की विधिवत घोषणा 15 फरवरी को महाशिवरात्रि पर पंचकेदार गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर, उखीमठ में की जाएगी। इस दौरान वर्ष 2026 के लिए केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि भी घोषित की जाएगी। इस दौरान डंगवाड़ी, भटवाड़ी, चुनी-मंगोली, किमाणा एवं पचौली डुंगर सेमला के हक-हकूकधारी एवं दस्तूरधारी ग्रामीण भी इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनेंगे।
सदियों पुरानी रावल परंपरा
केदारनाथ धाम में रावल परंपरा अत्यंत प्राचीन है। करीब चार सौ से अधिक वर्षों से चली आ रही परंपरा के तहत भुकुंड लिंग केदारनाथ के पहले रावल थे। गणेश लिंग दूसरे, शोम लिंग तीसरे, हर लिंग चौथे और वीर लिंग पांचवें रावल हुए। वर्तमान में भीमाशंकर लिंग 324वें रावल हैं और अब शिवाचार्य केदार लिंग 325वें रावल के रूप में यह आध्यात्मिक दायित्व संभालेंगे।
केदारनाथ के रावल अविवाहित होते हैं। कर्नाटक के वीर शैव संप्रदाय से संबंध रखते हैं और शिव उपासक होते हैं। रावल परंपरानुसार केदारनाथ की पूजा के मुख्य कर्ताधर्ता होते हैं। रावल केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने और कपाट बंद होने पर धाम में मौजूद रहते हैं।
