मां नंदा के कैलाश प्रस्थान की अद्भुत यात्रा आज से, कुरुड़ से शुरू हो रही है नंदा बड़ीजात, चौसिंग्या खाडू करेगा अगुआई
रैबार डेस्क: प्रकृति की सुरम्य वादियों के बीच 21 दिनों तक करीब 295 किलोमीटर लंबी पैदल धार्मिक यात्रा, जिसे हिमालयी महाकुंभ भी कहा जाता है। उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में 12 साल बाद फिर से वही रौनक, वही भक्ति भाव और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला है। अंतर बस इतना है कि इस बार इसे नंदा बड़ीजात का नाम दिया गया है जो आज से कुरुड़गांव से शुरू हो रही है। मां नंदा की बड़ी लोकजात यात्रा पांच सितंबर को अपराह्न तीन बजे नंदा सिद्धपीठ कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना होगी। पांच निर्जन और 21 आबादी वाले पड़ावों से पैदल गुजरने वाली 296 किमी की इस धार्मिक यात्रा की अगुआई चौसिंग्या खाडू करेगा। उसे 20 सितंबर को होमकुंड में देवी नंदा के साथ कैलास के लिए विदा किया जाएगा।
दरअसल हिमालय में 12 साल के अंतराल पर नंदा राजजात का आय़ोजन होता है। इस बार दो पक्षों में मतभेदों के चलते राजजात का कार्यक्रम अगले साल के लिए टाल दिया गया, लेकिन मां नंदा देवी समिति कुरुड़ ने इसी वर्ष तय तारीखों के हिसाब से बड़ी लोकजात आयोजित करने का फैसला लिया है। जो 5 सितंबर से 30 सितंबर तक चलेगी।
25 दिनों तक हजारों यात्रा मां नंदा की डोलियों के साथ 295 किलोमीटर की दुर्गम यात्रा को पूरा करेंगे। कुरुड़ मंदिर से शुरू होकर ये यात्रा 12 सितंबर को रामणी गांव पहुंचेंगी।
उसके बाद आला, सितेल, कनोल पड़ाव से होते हुए 15 सितंबर को बड़ी जात, लाटी देवता के धाम वाण गांव पहुंचेगी।
यहां से जात रणकधार और गैरोलीपातल होते हुए 18 सितंबर को वेदनी बुग्याल पहुंचेगी, इसके बाद बगुवावासा, पातर नचौणिंया, कैलवा विनायक, रुपकुंड, ज्योंरागली होते हुए नंदा की बड़ीजात 20 सितंबर को होमकुंड पहुंचेगी और इसी दिन यहां चौसिंग्या खाडू की विदाई होगी। इसके बाद मां नंदा को विदा करके श्रद्धालु मां नंदा की उत्सव डोली के साथ वापस लौटेंगे और 30 सितंबर को कुरुड़ पहुंचने पर बड़ीजात यात्रा का समापन होगा।
चौसिंग्या खाडू
इस अद्भुत यात्रा का सबसे खास पहलू है चार सींगों वाला नर भेड़ यानी चौसिंग्या खाडू। ये चौसिंग्या खाडू ही मां नंदा की राजजात या बड़ीजात की अगुआई करता है। इसे मां नंदा का शुभदूत और संदेशवाहक माना जाता है। यात्रा के दौरान खाडू की पीठ पर ओढाए जाने वाले कपड़े पर मां नंदा के लिए श्रृंगार सामग्री, वस्त्र स्थानीय पकवान, कीमती आभूषण बांधते हैं। यात्रा के अंतिम पड़ाव होमकुंड पहुंचने के बाद इसे कैलाश की ओर अकेला विदा किया जाता है, जहां यह हिमालय की श्रृंखलाओं में आगे जाकर अंततः विलुप्त हो जाता है।
राजजात बनाम बड़ीजात
बता दें कि, इस साल कुरुड़ मंदिर समिति बड़ी लोकजात यात्रा का आयोजन कर रही है। 12 वर्ष का समय चक्र इस साल पूरा होने के कारण कुरुड़ समिति ने अपनी परंपरा के अनुसार इसी साल 5 सितंबर से 25 सितंबर 2026 तक यात्रा को आयोजित करने का फैसला लिया है। जबकि मुख्य नंदा देवी राजजात यात्रा 2027 में होगी। नौटी राजजात समिति और प्रशासन ने इसे 2027 तक स्थगित करने का सर्वसम्मति से फैसला लिया है। समिति और प्रशासन का मानना है कि 2026 के पंचांगीय कालक्रम के दौरान मलमास आ रहा है और ऐसे समय में हिंदू मान्यताओं के अनुसार, बड़े स्तर के मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं. इस स्थिति को देखते हुए पंचांगीय गणना के आधार पर यात्रा को 2027 तक आगे बढ़ाया गया। राजजात यात्रा मार्ग बेहद खतरनाक और रूपकुंड और शिला समुद्र जैसे ग्लेशियरों से होकर गुजरता है। इस दुर्गम रास्ते को यात्रा के लिए दुरुस्त करने और यहां बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए सरकार और प्रशासन ने एक साल का अतिरिक्त समय मांगा था। साथ ही इतनी बड़ी यात्रा में सुरक्षा व्यवस्था भी पुख्ता की जाएगी। लिहाजा 12वर्ष के अंतराल पर मान्यता के हिसाब से इस साल कुरुड़ की बड़ी लोकजात हो रही है जो चमोली जिले के सिद्धपीठ कुरुड़ देवराड़ा से प्रारंभ हो रही है। इसका आयोजन नंदा देवी कुरुड़ मंदिर समिति के हक-हकूकधारी कर रहे हैं। जबकि अगले साल नंदा राजजात का आयोजन होगा जो चमोली जिले के नौटी गांव से प्रारंभ होगी।
