2026-09-23

फर्जी सर्टिफिकेट से कब्जाई MBBS सीट, 45 लाख में हुआ था सौदा, सरगना समेत दो आरोपी गिरफ्तार

रैबार डेस्क: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से फर्जी प्रमाणपत्रों के सहासे एमबीबीबीएस में दाखिला पाने के मामले में देहरादून पुलिस ने मुख्य सरगना समेत दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर एक मेडिकल सीट हासिल करने के लिए 45 लाख रुपये में सौदा किया गया था। जिसके लिए 20-20 लाख रुपये एडवांस लिए गए थे। क्लास शुरू होने के बाद बाकी रकम लेने की बात तयकी गई थी।

देहरादून पुलिस ने इस मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया है। एसएसपी ने बताया कि एसआईटी टीम द्वारा प्रकरण में संलिप्त अभियुक्तों के विरुद्ध साक्ष्य संकलन की कार्रवाई करते हुए प्रकरण से जुड़े सभी दस्तावेजों को कब्जे मे लिया गया. एसआईटी जांच के दौरान उक्त सभी अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में अंकित पते गलत पाये गगए। इस पर एसआईटी द्वारा सम्बन्धित शिक्षण संस्थानों में जाकर प्रकरण से जुड़े सभी दस्तावेजों को कब्जे में लिया गया। उनकी जांच से उक्त अभ्यर्थियों के मूल पतों की जानकारी प्राप्त हुई। प्राप्त जानकारी और जांच के दौरान प्रकाश में आये साक्ष्यों के आधार पर एसआईटी द्वारा 02 व्यक्तियों, 1- रूपेश पंडित तथा 2- अरविन्द कुमार को पूछताछ हेतु थाना रायपुर पर लाया गया, जिनसे आवश्यक पूछताछ व प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर पुलिस द्वारा उन्हें मौके से गिरफ्तार किया गया। एसआईटी ने खुलासा किया है कि फर्जी सर्टिफिकेट बनाने के लिए 45 लाख रुपए में सौदा हुआ था।

45 लाख में हुआ सौदा

एसआईटी के मुताबिक रूपेश पंडित पांच वर्षों से एजुकेशन कंसल्टेंसी का काम कर रहा था, वह मेरठ में मेकोडो नाम से कंपनी चला रहा था और विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों तथा विदेशों में एमबीबीएस, बीटेक, बीडीएस और बीवीआर आदि पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिलाने के लिए कमीशन पर काम करता था। जबकि दूसरा गिरफ्तार आरोपी अरविंद कुमार, ग्राम बहादरपुर खादर, लक्सर, हरिद्वार का निवासी बताया गया है। पुलिस के मुताबिक अरविंद रूपेश का पुराना परिचित है और उसने अपनी बेटी परी के दाखिले के लिए रूपेश से संपर्क किया था।

रुपेश ने अरविंद से कहा कि उसकी बेटी और उसके दो अन्य परिचितों के बच्चों को भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कोटे से एमबीबीएस में एडमिशन दिलवाएगा। लेकिन इसके लि एप्रत्येक एडमिशन के बदले 45-45 लाख रुपए चुकाने होंगे। तीनों अभ्यर्थियों के परिजनों से रूपेश तथा उसके साथियों द्वारा एडवांस के तौर पर 20-20 लाख रुपए लिये गये थे तथा एमबीबीएस में दाखिले व क्लासों के शुरू होने के बाद बाकी के पैसे देने की बात तय हुई थी।

फर्जी प्रमाण पत्र बनाए

अभियुक्त रूपेश पंडित ने अपने साथियों के साथ मिलकर तीनों अभ्यर्थियों के कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर फर्जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र बनावाये और उनके आधार पर उक्त तीनों अभ्यर्थियों द्वारा अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस कोर्स के लिये दाखिला दाखिला करवाया गया।

इन गिरफ्तारियों के बाद अब एसआईटी यह पता लगा रही है कि प्रमाणपत्र तैयार कराने में कौन-कौन लोग शामिल थे, दस्तावेज कहां तैयार हुए,  सरकारी पोर्टल पर आवेदन किसने किए, सत्यापन की प्रक्रिया में क्या हुआ और मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के समय इन दस्तावेजों को किस स्तर पर स्वीकार किया गया।

क्या है एमबीबीएस एडमिशन फर्जीवाड़ा

दरअसल उत्तराखंड में नीट-यूजी काउंसलिंग के दौरान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित और अन्य स्थानीय आरक्षण कोटे का लाभ से जुड़ा है। आरोप है कि उत्तराखंड में स्वतंत्रा सेनानी आश्रितों के फर्जी प्रमाण पत्र बनाकर मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन लिया गया।

ऐसा आरोप है कि कुछ अभ्यर्थियों ने मृत या अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के फर्जी आश्रित प्रमाण पत्र बनवाकर राज्य कोटे की आरक्षित एमबीबीएस और बीडीएस सीटों पर प्रवेश हासिल किया। जांच में सामने आया कि प्रशासनिक रिकॉर्ड में एक ही स्वतंत्रता सेनानी के नाम और जाली दस्तावेजों का उपयोग करके कई अलग-अलग अभ्यर्थियों ने खुद को उनका पोता/आश्रित बताकर कोटे का लाभ ले लिया।

चार छात्राओं को एक ही स्वतंत्रता सेनानी के नाम से सर्टिफिकेट

प्रशासनिक जांच में तृप्ति, स्वाति, खुशी और परी नाम के अभ्यर्थियों के आवेदन में विसंगितयां मिली। चारों के दस्तावेजों में धर्मवीर वर्मा पुत्र खजान सिंह के नाम का कथित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिचय पत्र लगाया गया था। लेकिन एक फरवरी 2005 से सुरक्षित स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के उत्तराधिकारियों को जारी परिचय पत्रों की सरकारी पंजिका में धर्मवीर वर्मा का नाम नहीं मिला। जांच यहीं नहीं रुकी। तृप्ति के आवेदन में मोथरोवाला का पता दर्ज था, लेकिन मौके पर न वह मिली और न ही उसके परिवार के किसी सदस्य के वहां रहने की पुष्टि हुई। आवेदन में दिया मोबाइल नंबर भी किसी दूसरे व्यक्ति का मिला।वहीं स्वाति, खुशी और परी के आवेदन में राजीव नगर, तरली कंडोली का पता दर्ज था। स्थलीय सत्यापन में तीनों अभ्यर्थियों अथवा उनके परिवारों के वहां रहने की पुष्टि नहीं हुई। स्थानीय लोगों और क्षेत्रीय पार्षद से पूछताछ में भी दर्ज पते पर उनके निवास की जानकारी नहीं मिली। इन मामलों में दिए गए मोबाइल नंबर भी अन्य लोगों के पाए गए। दिलचस्प बात ये है कि असली परिवार ने ऐसे किसी लाभ का दावा ही नहीं किया था।

चारों के MBBS दाखिले रद्द

तहसीलदार की विस्तृत जांच के बाद चारों प्रमाणपत्रों को संदिग्ध मानते हुए निरस्त करने की संस्तुति की गई। इसके आधार पर एसडीएम सदर अपूर्वा सिंह ने 10 सितंबर 2026 को चारों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र निरस्त कर दिए। इसके बाद एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने भी चारों एमबीबीएस दाखिले रद्द कर दिए। विश्वविद्यालय के अनुसार चारों सीटें रिक्त मानी गईं और उन्हें आगे की काउंसलिंग में शामिल करने की प्रक्रिया तय की गई।

इसके बाद व्हिसलब्लोअर और पत्रकारों द्वारा स्वास्थ्य मंत्री और प्रशासन को सौंपे गए दस्तावेजों में 350 से अधिक डोमिसाइल यानी निवास और अन्य आरक्षित श्रेणियों जिनमें SC, ST, OBC, EWS आदि के प्रमाण पत्र भी संदिग्ध बताए गए हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस प्रशासन ने एसपी ग्रामीण जया बलूनी के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल यानी SIT का गठन किया है। एसआईटी, एसडीएम और पटवारी कार्यालयों से जुड़े दस्तावेजों और सरकारी प्रक्रिया की गहराई से जांच कर रही है। इस मामले में रायपुर और क्लेमेनटाउन थानों में अलग-अलग मुकदमे दर्ज हुए हैं। क्लेमेनटाउन मामले में तृप्ति और उसकी मां उमा रानी नामजद हैं, जबकि रायपुर मामले में खुशी, परी और स्वाति के नाम सामने आए।

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