अल्मोड़ा के शेखर बिष्ट ने पिरूल को बनाया रोजगार और महिला सशक्तीकरण का जरिया, CM की सोच को धरातल पर उतारा

क्या उत्तराखंड के जंगलों में आग का प्रमुख कारण बन रही चीड़ की पत्तियों को रोजगार का जरिया बनाया जा सकता है? क्या चीड़ की पत्तियों यानि पिरूल का सदुपयोग बिजली बनाने में भी किया जा सकता है। क्या ये पिरूल महिला सशक्तीकरण का उदाहरण पेश कर सकता है। जी हां इन तीनों बातों को सच साबित किया है अल्मोड़ा के शेखर बिष्ट ने। दरअसल द्वाराहाट तहसील के कुंथारी गांव के शेखर बिष्ट पिरूल से बायोमास बनाने की उत्तराखंड सरकार की सोच को पिछले चार साल से धरातल पर उतारने में लगे हैं। इस काम में उन्हें सफलता भी मिली है, और सफलता से उत्हासित होकर शेखर अवनी संस्था के साथ 5 अन्य जगहों पर पिरूल बायोमास के प्लांट लगाने में जुटे हैं। चलिए अब आपको शेखर बिष्ट की कहानी विस्तार से बताते हैं।

  32 वर्षीय शेखर बिष्ट का जीवन संघर्षों भरा रहा। आईटीआई और पॉलीटेक्निक करने के बाद पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। शहरों में टाटा मोटर्स जैसे कई नामी कंपनियों में नौकरी भी की। लेकिन पहाड़ के लिए कुछ करने की टींस उन्हें सालती रही। शहरों की नौकरी पर जल जंगल और जमीन का विचार शेखर के मन मे हावी रहा।

  हर साल पिरूल के कारण जंगलों की आग का तांडव देखने के बाद शेखर के मन में विचार आया कि क्यों न इस पिरूल का कुछ सदुपयोग किया जाए। बस फिर क्या था। बिष्ट ने पिरूल से बिजली उत्पादन के विषय पर कई सालों तक रिसर्च की। उन्होंने पढ़ाई के दौरान ही इस पर काम शुरू किया था और इस काम में उन्हें ‘अवनि संस्था’ का सहयोग भी मिला। शेखर ने अपने गांव में इसका प्रयोग शुरू किया। 2016 में गांव मे पिरील से बायोमास बनाने का प्लांट स्थापित किया। सरकार ने शेखर बिष्ट के प्रयोग को सराहा। त्रिवेंद्र सरकार ने पिरूल नीति लागू की तो शेखर के सपनों को पंख लगे। सरकार ने तय किया कि पिरूल से बिजली बनाने वालो की बिजली को यूपीसीएल खरीदेगा और अच्छा खास भुगतान भी करेगा। कुछ समय बाद प्लांट में स्थापित हुआ तो पिरूल कलवेक्शन के लिए गांव की महिलाओं को जोड़ा। सीजन में शेखर आस पास के गांव की करीब 20 से 25 महिलाओं को पिरूल कलेक्शन के लिए 2 रुपए प्रति किलो के हिसाब से भुगतान करते हैं। इससे स्थानीय महिलाओं की आजीविका का साधन भी जुट रहा है।

  शेखर बताते हैं कि उन्होंने द्वारहाट में अपना प्लांट सेट-अप किया और 2017 से बिजली उत्पादन करना शुरू किया। उनके प्लांट की उत्पादन क्षमता 25 किलोवाट है। यानि इस प्लांट से शेखर रोजाना 200 से 250 यूनिट बिजली पैदा कर रहे हैं। इस बिजली को यूपीसीएल को 7.54 रुपए प्रति यूनिट की दर से बेच रहे हैं। इस तरह शेखर हर महीने लगभग 6 हज़ार यूनिट्स कंपनी को बेचते हैं जिससे उन्हें हर महीने 45 से 50 हज़ार रुपये की कमाई हो जाती है।

साल के चार महीने पिरूल कलेक्शन का काम होता है, इन चार महीनों में जंगलों से इतना पिरूल इक्ट्ठा कर लिया जाता है जिससे सालभर बिजली पैदा की जा सके। बिष्ट ने अपने प्लांट में काम करने के लिए 4 लोगों को रोजगार भी दिया हुआ है ये चार लोग दो शिफ्ट में प्लांट का कामकाज संभालते हैं। इस तरह से शेखर का पिरूल का यह पिरूल मॉडल कमाई और रोज़गार, दोनों का अच्छा विकल्प साबित हो रहा है। साथ साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी अहम साबित हो रहा है।

  शेखर कहते हैं कि कि आज के समय जल, जंगल औऱ जमीन को बचाने का संकल्प हर नागरिक को लेना जरूरी है। औऱ यह पिरूल प्लांट इन तीनो संकल्पों को पूरा करता है। पिरूल का सदुपयोग क्लीन एनर्जी को बनाने में हो रहा है, जंगलों से पिरूल उठान के बाद आग को फैलने से नियंत्रित किया जा सकता है। शेखर का कहना है कि यह बहुत अच्छी बात है कि उत्तराखंड सरकार ने इस तरफ ध्यान दिया है। लेकिन सरकार को पिरूल योजना के तहत प्रोजेक्ट लगाने वालों के लिए और ज्यादा सब्सिडी देनी चाहिए।

इस प्लांट की सफलता के बाद अब शेखर अवनी संस्था के साथ मिलकर 5 अन्य जगहों पर भी प्लांट स्थापित कर रह हैं। आजकल पौड़ी जिले में भी पिरूल प्लांट स्थापित कर रहे हैं। शेखर अब पिरूल से बायो डीजल बनाने की दिशा में भी काम करे रहे हैं। शेखर का कहना है कि इस तरफ गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए, तभी जाकर युवा साथी पर्यावरण बचाने को प्रेरित होंगे और रोजगार के साधन भी तलाश पाएंगे।

ऐसे काम करता है पिरूल प्लांट

प्लांट में सबसे पहले पिरूल को जलाया जाता है और इससे निकलने वाले गैस को जनरेटर और गैसीफायर द्वारा ऊर्जा में बदला जाता है। फिर इस ऊर्जा को पैनल और ग्रिड्स के ज़रिए बिजली में परिवर्तित कर यूपीसीएल को दिया जाता है।

पिरूल नीति

उत्तराखंड सरकार की पिरूल नीति के तहत एक से लेकर दस किलोवाट तक का सिस्टम भी लग सकेगा। इसके अलावा उच्च क्षमता के सिस्टम से भी आम आदमी बिजली उत्पादित कर सकेंगे। यह बिजली उत्तराखंड पावर कारपोर्रेशन खरीदेगा।

उरेडा ने पिरूल नीति के तहत पिरुल उद्योग लगाने वालों के लिए 31 जुलाई तक आवेदन मांगें हैं। जिसके तहत उत्पादित बिजली को यूपीसीएल खरीदेगा।

एक यूनिट का पैसा लेवलाइज टैरिफ के हिसाब से 7.54 रुपये तक संबंधित सिस्टम लगाने वाले को मिल सकेगा

सिस्टम लगाने के इच्छुक लोगों को 10.50 लाख रुपये की धनराशि उपक्रम लगाने को व्यय करनी होगी।

25 किलोवाट तक के सिस्टम लगाने पर 4.50 लाख रुपये भारत सरकार और 10 लाख रुपये केंद्र सरकार से अनुदान भी मिलेगा।

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